Categories: Success story

Parle G success story hindi: एक दर्जी ने शुरू किया था parleg आज दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्कुट। 17000 करोड रुपए का रेवेन्यू।

Parle G success story hindi: एक दर्जी ने शुरू किया था  P arle-G आज दुनिया में सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्कुट।

Parle G success story hindi : कैसे बना भारत का सबसे लोकप्रिय बिस्किट Parle-G । जानिए मोहनलाल दयाल चौहान की संघर्ष से सफलता तक की प्रेरणादायक कहानी, Parle कंपनी का इतिहास, बिजनेस ग्रोथ के बारे में ,

भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जिसने कभी Parle-G बिस्किट नहीं खाया हो। यह बिस्किट 1930 से भारतीय परिवारों का हिस्सा रहा है। चाय के साथ सबसे पहले जो बिस्किट याद आता है, वह है Parle-G।

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस मशहूर ब्रांड की शुरुआत एक छोटे से सिलाई का काम करने वाले व्यक्ति ने की थी ।

आज Parle-G भारत की सबसे बड़ी FMCG कंपनियों में से एक है।

साल 1900 के आस पास गुजरात के एक छोटे से गांव से एक 12 साल का एक लड़का रोजगार की तलाश में मुंबई पहुंची । जिस लड़के का नाम मोहनलाल दयाल चौहान था ।

मुंबई आने के बाद उन्होंने जीवन यापन के लिए सिलाई का काम सीखना शुरू किया । सिलाई  सीखने के बाद  शुरुआत में उन्होंने  दूसरों की दुकानों पर काम किया और धीरे धीरे अपने कम में माहिर हो गए ।

6 साल बाद में 18 साल की उम्र में उस लड़के ने मुंबई के ही विले पार्ले इलाके में अपनी दुकान शुरू की।  शुरुआत से ही उनका काम अच्छा चलने लगा ओर कुछ ही सालों में उसने दो कंपनियों की नींव  रखी थी ।

पहली  डी- मोहनलाल एंड कंपनी ,दूसरी छिवा दुर्लभ । आगे चलकर वो लड़का नामी सिल्क व्यापारी मोहनलाल दयाल के नाम से मशहूर हुआ । जिन्होंने आगे चलकर PARLE -G ब्रांड बनाया।

सिल्क बिजनेस से शुरू हुआ सफर

मोहनलाल दयाल ओर उनकी फैमिली

Parle G success story hindi: मोहनलाल दयाल  चौहान ने शुरुआत में कपड़े ओर सिल्क का व्यापार  शुरू किया । उस समय उनका बिजनेस तेजी से बढ़ रहा था । ओर जाने माने सिल्क व्यापारी बन गए थे । मोहनलाल दयाल के पांच बेटे थे । मानकलाल, पीतांबर ,नरोत्तम  कांतिलाल और जयंतीलाल । मोहनलाल अपने काम पर बेटों को ले जाते और बिजनेस  की ट्रेनिंग देते ।

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान  कपड़ों के बिजनेस में काफी  उतार चिड़ाव आया । इस बजह से पिता ने बेटों के साथ मिलकर  सिल्क कपड़ों का व्यापार बंद करने का फैसला किया ।  1928 में सभी ने कन्फेशनरी कंपनी खोली जिसका नाम रखा था “हाउस आफ पारले”।

पहले विदेश से ही बिस्किट भारत आता  था । जिसे केवल अमीर ही खा  पाते थे । मोहनलाल चाहते थे कि देश में ऐसी कंपनी हो जो गरीबों को भी  बिस्किट का स्वाद चखाए।  वह जर्मन गए और कनफेक्शनरी की  कला सीखी। 1929  में कन्फेशनरी मेकिंग मशीन खरीद कर भारत लौटे जिस मशीन को उन्होंने उस समय 60,000 रुपए में खरीदा था।

PARLE कंपनी की स्थापना

साल 1928 में मोहनलाल चौहान और उनके परिवार ने मिलकर Parle Products कंपनी की शुरुआत की। यह फैक्ट्री मुंबई के विले पार्ले इलाके में लगाई गई थी। इसी इलाके के नाम पर कंपनी का नाम PARLE रखा गया। शुरुआत में कंपनी में केवल 12 लोग काम करते थे, जो परिवार के ही सदस्य थे।

कैंडी ओर टॉफी के बाद 1939 में शुरू हुआ बिस्किट का उत्पादन

पार्ले ने फैक्ट्री शुरू करने के बाद सबसे पहले ऑरेंज कैंडी ओर टॉफी  बनाना शुरू किया । 10 साल बाद 1939 में बिस्किट बनाना शुरू किया। उस वक्त तक मार्केट में यूनाइटेड बिस्किट , इंटली एंड पाल्मर्स , ब्रिटानिया और ग्लासको जैसे ब्रिटिश ब्रांड के बिस्किट का कब्जा था ।  पारले ने अपने बिस्किट को आम जनता के लिए कम कीमत में लॉन्च किया।  भारत में बना भारतीय जनता के लिए , हर भारतीय को उपलब्ध बिस्किट जल्दी लोकप्रिय हो गया ।

मोहनलाल के बड़े बेटों ने  बिस्किट में वैरायटी लाने का फैसला किया । जिसके बाद पद पारले ग्लूको बिस्किट ओर मोनाको बिस्किट की शुरुआत हुई । जिसका नाम मोहनलाल के बड़े बेटे माणिकलाल ने यूरोप के एक खेल मैदान के नाम पर रखा । उस  वक्त युद्ध की वजह से विदेशी बिस्किट भारत नहीं आ पा रहे थे।  इसका सीधा फायदा  पारले कंपनी को मिला ।  दूसरी और ब्रिटिश इंडियन आर्मी में पारले जी की डिमांड बढ़ी । से

आजादी के बाद आया बड़ा संकट

Parle G success story hindi: 1947 में जब देश आजाद हुआ । पाकिस्तान के अलग होते ही अचानक  देश में गेहूं की कमी आ गई । पारले को ग्लूको बिस्किट का उत्पादन रोकना  पड़ा। इसी  संकट से उबरने के लिए पारले ने गेहूं की जगह जौ से बिस्किट बनाना शुरू किया । कंपनी ने  स्वतंत्रता सेनानियों से भी जौ के बिस्किट खाने की अपील की।

1960 के दशक तक कई अन्य ब्रांड ने भी  ग्लूकोस बिस्किट लॉन्च किए। जिससे कंज्यूमर कंफ्यूज हो गए कि कौन सा बिस्किट खाए ।  इसका असर पारले बिस्किट की बिक्री पर भी पड़ा ।  कंपनी  ने नई पैकेजिंग बनाने पर  का काम शुरू किया । इसके बाद पारले एक पीले बैक्स पेपर में लपेटकर बनाने लगा।  इसके ऊपर लाल रंग के पारले ब्रांडिंग के साथ एक छोटी लड़की की तस्वीर थी ।

पारले ग्लूको बन गया parle -G

पारले बना Parle -G

नई ब्रांडिंग ने बच्चों के साथ उनकी माओ को भी आकर्षित किया।  लेकिन अन्य ग्लूकोस बिस्किट से पारले  कैसे अलग दिखे ये समस्या पहले जैसी थी । 1982 में पारले ग्लूको को पारले जी के रूप में री पैकेज किया गया । इसमें G का मतलब था “ग्लूको “। पैकेजिंग को भी वेक्स पेपर से बदलकर  कम कीमत वाले प्रिंटिंग प्लास्टिक कवर में कर दिया गया । छोटी बच्ची का फोटो अभी भी  इस पैकेट पर मौजूद था।  कंपनी के इस कदम ने ही पारले को दूसरी कंपनियों के  बिस्किट्स से अलग खड़ा कर दिया।

पारले के लोकप्रिय प्रोडक्ट

1983 में पारले ने चॉकलेटी ट्रॉफी “मेलोडी “लॉन्च की । 1986 में मैंगो वाइट लेकर आई।  जो भारत की पहली मैंगो कैंडी थी।  1996 में पारले  ने  अपनी रेंज को और बढ़ाया । ओर हाइट एंड सीक चौकों चिप कुकी लॉन्च किया ।  1991 2000 के दौरान कंपनी की ग्रोथ इंडिया के बाहर होने लगी थी।  इसके बाद 2000 में पारले ने दो नए  बिस्किट 20- 20 बटर कुकीज और मैजिक्स को लांच किया।  2011 में पारले ने  प्रीमियम बिस्कुट की कैटेगरी में” प्लेटिना “बनाया।

कोरोना में बढ़ी Parle -G की मांग

2020 की शुरुआत में जब  कोरोना आया ।  करोना के  दौरान मार्केट में parle -G की हिस्सेदारी 4 से 5% तक बढ़ी।  यह बीते चार दशक में सबसे ज्यादा थी।

क्योंकि लॉकडाउन की वजह से लोग  बाहर नहीं निकल पा रहे थे।ज्यादातर लोगों ने बड़ी मात्रा में पारले-जी बिस्कुट खरीद कर स्टॉक कर लिया। इसके अलावा सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं ने भी लोगों की मदद के लिए जो खाने के पैकेट बांटे,उनमें parle -G बिस्किट को शामिल किया गया ।

प्रवासी लोगों को दिया जीवनदान

लॉकडाउन के दौरान पार्ले प्रोडक्ट्स ने  कम कीमत वाले पारले-जी की प्रोडक्शन पर ज्यादा फोकस किया गया था । दरअसल प्रवासी मजदूरों के लिए पारले जी आसानी से ओर सस्ते में मिलने वाला खाना था । ऐसे में 2 रुपए ओर 5 रुपए के पारले जी के पैकेट प्रवासी मजदूरों के लिए जरूरत बन चुका था।  लॉकडाउन के समय जिन्हें एक वक्त की रोटी नहीं मिल पा रही थी ।  उन लोगों की भूख को पारले जी ने कम किया ।

भारत के साथ ही अमेरिका, ब्रिटेन ,कनाडा ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में parle -G का बिजनेस है।  2025 में पारले का रेवेन्यू  15568 करोड़ पहुंच गया । इस आंकड़ों को पार करने वाली पारले भारत की पहली पैकेज्ड  फूड कंपनी है ।

पारले का सफर 

1928 में मोहनलाल दयाल ने  साल 1928  में पारले हाउस की स्थापना की थी।

फैक्ट्री में परिवार के 12 लोगों के साथ काम की शुरुआत की।  1939 मे पारले ने अपना पहला बिस्किट पार्ले ग्लूको बनाया  ।

इसी साल  साल्टेड बिस्किट मोनाको  को भी मार्केट में लॉन्च किया । 1941 में कंपनी टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में आगे बड़ी पैकेजिंग की नई टेक्निक्स अपनाई ।

पारले ने  बैंकिंग के लिए  सबसे लंबा ओवन बनाया।  जिसकी साइज करीब 250 फीट थी  ।

पारले ने  1963 में  किस्मी टॉफी  लॉन्च की।  इसका मकसद कपल्स को अट्रैक्ट करना था।

1966 में पॉपिंस के साथ पार्ले ने अपनी कनफेक्शनरी रेंज को बढ़ाया ।

पारले का अचीवमेंट्स

1971 में फूड प्रोडक्ट के गुणवत्ता के लिए दिए जाने वाला Monde सिलेक्शन अवार्ड पारले को मिला।  यह एक प्रेस्टीजियस अवार्ड है जो बेल्जियम का इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर  क्वालिटी इलेक्शन देता है। ये अवॉर्ड 90 से ज्यादा देशों  को दिया जा रहा है। यह भारत में पहली बार किसी फूड कंपनी को मिला था। swiggy success story in hindi : तीन दोस्तों ने मिलकर शुरू की  Swiggy। 4 साल में बनी यूनिकॉर्न और 10 साल में 8000 करोड़ का कारोबार 

1972 में पारले ने नमकीन बिस्किट क्रैकजैक लॉन्च किया । बिस्किट का टेस्ट मीठा और नमकीन दोनों था।  जो हर उम्र के लिए लोगों को पसंद आया । 1982 में पारले ग्लूको का नाम बदलकर parle -G कर दिया गया । यहां G का मतलब ग्लूको है ।

आज दुनिया का सबसे ज्यादा बिकने वाला बिस्कुट parle -G है ।देश में पारले जी की 130 से ज्यादा फैक्ट्री मौजूद है।  हर महीने 100 करोड़ से ज्यादा पैकेट का उत्पादन होता है।  हर सेकंड 4500 लोग parle -G का बिस्कुट खाते है । देश के 50 लाख से ज्यादा रिटेल स्टोर्स में बिक्री होता है।   21 से ज्यादा देशों में पारले के  प्रोडक्शन का एक्सपोर्ट होता है। आज  भारत का नंबर वन FMCG ब्रांड PARLE -G है । 2025 में पारले का रेवेन्यू 15568 करोड़ रुपए था।

रोचक बाते 

 कौन है पैकेट पर दिखने वाली बच्ची: पारले-जी के पैकेट पर दिखने वाली बच्ची की तस्वीर किसी वास्तविक व्यक्ति की नहीं, बल्कि 1960 के दशक में कलाकार मगनलाल दहिया द्वारा बनाई गई एक काल्पनिक चित्रकारी है।

स्वदेशी विकल्प: 1947 में आजादी के बाद, इसे ब्रिटिश ब्रांडों के मुकाबले एक भारतीय विकल्प के रूप में विज्ञापित किया गया था।

शुरुआती फैक्ट्री: मुंबई के विले पारले स्थित इसकी मूल और सबसे पुरानी फैक्ट्री को 2016 में उत्पादन बंद होने के बाद जनवरी 2026 में इसे तोड़ दिया गया । https://en.wikipedia.org/wiki/Parle-G

Parle -G को चीनी और खाद्य तेल के मिश्रण से बनाया जाता है, जिसमें दूध और गेहूं के गुण होते हैं।

Parle-G success story hindi हमें सिखाती है कि छोटे से शुरू होकर भी बड़ा साम्राज्य बनाया जा सकता है।

 

safltakikhani@gmail.com

View Comments

Recent Posts

LG Success story in hindi: क्रीम, टूथपेस्ट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक का सफर ।

LG Success story in hindi: क्रीम, टूथपेस्ट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक का सफर ।  LG…

4 days ago

BSNL Success story hindi : 2026 में BSNL ने कैसे जिओ ओर एयरटेल को टक्कर दी।

BSNL Success story hindi : 2026 में BSNL ने कैसे जिओ ओर एयरटेल को टक्कर…

2 weeks ago

Repido success story in  hindi : कैसे एक जीरो स्टार्टअप बना इंडिया का बाइक टैक्सी किंग

Repido success story in  hindi : कैसे एक जीरो स्टार्टअप बना इंडिया का बाइक टैक्सी…

3 weeks ago

Patanjali success story:  पतंजलि की सफलता ओर विवादों की कहानी 

Patanjali success story:  पतंजलि की सफलता ओर विवादों की कहानी    Patanjali success story:  भारत…

4 weeks ago

Telegram success story : रूस से भागकर शुरू की Telegram । आज 100 करोड़ से ज्यादा एक्टिव

Telegram success story : रूस से भागकर शुरू की  Telegram । आज 100 करोड़ से…

4 weeks ago