Bata success story hindi: कैसे किराए के दो कमरों से शुरू हुई बाटा, आज 90 देशों में कारोबार करती है। जानिए थॉमस बाटा की सफलता की पूरी कहानी हिंदी में।
क्या आप जानते है कि दुनिया के सबसे बड़े फुटवियर ब्रांडों में शामिल बाटा की शुरुआत किसी आलीशान फैक्ट्री से नहीं, बल्कि किराए के दो छोटे कमरों से हुई थी।
जिस युवक के पास बिजनेस शुरू करने के लिए पैसे नहीं थे, उसने अपनी मां से उधार लेकर एक छोटा-सा काम शुरू किया। बीच रास्ते में कंपनी दिवालिया भी हुई, लेकिन हार मानने के बजाय उसने चमड़े की जगह कैनवास के सस्ते जूते बनाकर पूरी इंडस्ट्री की सोच बदल दी। आज वही बाटा 90 से अधिक देशों में मौजूद है, हजारों स्टोर चला रही है और करोड़ों लोगों के पैरों तक अपने जूते पहुंचा चुकी है।
सफलता की कहानी आज हम बात करेंगे थॉमस बाटा की संघर्ष, मेहनत और bata success story hindi के बारे में ,
Bata success story hindi: 21 सितंबर 1894 को मध्य यूरोप के चेकोस्लोवाकिया में मोची का काम करने वाले थॉमस बाटा ने अपनी मां से कुछ पैसे उधार लेकर किराए के दो कमरों में जूते बनाने का काम शुरू किया। 5 साल बाद यानी 1899 में उन्होंने बाटा का पहला स्टोर चेकोस्लोवाकिया में खोला । पहले साल सब कुछ ठीक चल लेकिन दूसरे साल आर्थिक संकट आया। थॉमस की कंपनी को दिवालिया घोषित कर दिया गया।
इसके बाद थॉमस ने चमड़े की बजाय कैनवास पर जूते बनाने का फैसला किया। कच्चे माल सस्ते होने के कारण जूते भी सस्ते दाम पर मिलने लगे। फिर थॉमस तीन कर्मचारियों के साथ इंग्लैंड में एक जूते चप्पल की कंपनी में काम करने लगे । उन्होंने 5-6 महीने तक काम किया ओर व्यापार की बारीकियां सिखी ।
बाटा भारत की सबसे बड़ी फुटवियर कंपनियों में से एक है । भारत के 35% से ज्यादा मार्केट पर बाटा का दबदबा है । बाटा एक ऐसी कंपनी है जो लगती भारतीय पर ,है नहीं । आज बाटा का 90 देशों में बिजनेस चल रहा है। 5000 से ज्यादा स्टोर है। 165 देश में बाटा हर साल 1.7 करोड़ जूते बेचता है। भारत की बात करें तो बाटा के 1375 रिटेल स्टोर है ।
इंग्लैंड से लौटने के बाद थॉमस ने जूतों का प्रोडक्शन और बढ़ा दिया। 1905 तक हर रोज 2200 जोड़ी जूते बनाए जाने लगे। जल्दी ही बाटा यूरोप की सबसे बड़ी फुटवियर कंपनी बन गई। इसके बाद उन्होंने ऑफिस एम्पलाइज पर फोकस किया और जूते बनाना शुरू कर दिया इससे कंपनी को काफी फायदा हुआ। कंपनी की कामयाबी पीछे एक बड़ी वजह उसका छोटा नाम भी था । थॉमस ने अपने सरनेम को ही कंपनी का नाम बना दिया। ताकि लोगों को इसे याद रखने में ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़े।
1912 तक कंपनी के कर्मचारियों की संख्या 600 के पार हो चुकी थी। 1914 में कंपनी को सैनिकों के लिए जूते बनाने का एक बड़ा ऑर्डर भी मिला । इस वजह से कंपनी को अपने स्टाफ की संख्या बढ़ानी पड़ी। डिमांड बढ़ी तो बाटा ने नए स्टोर्स भी खोले । हालांकि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मंदी का दौर भी आया । जिससे जूता का प्रोडक्शन बुरी तरह से प्रभावित हुआ । इन हालातो से निपटने के लिए थॉमस ने जूतों की कीमतों को आधा कर दिया । इससे कंपनी का उत्पादन 15 गुना बड़ा ।
इसके बाद बाटा ने दूसरे देशों में कदम रखना शुरू किया। 1924 तक दुनिया में बाटा की 122 स्टोर थे । जूते के अलावा कंपनी मोजे ,टायर चमड़े से बनी और भी चीजें बनाकर बेचने लगी । थॉमस कंपनी के कर्मचारियों का काफी ज्यादा ध्यान रखते थे । 1930 में उन्होंने कर्मचारियों के लिए घर, उनके बच्चों के लिए स्कूल अस्पताल, लाइब्रेरी और छात्रों को मनोरंजन की व्यवस्था कर दी थी 1932 में हुई एक हवाई हादसे दौरान थॉमस बाटा की मौत हो गई उनकी मौत के बाद उनके बेटे जे बाटा ने पिता का बिजनेस संभाला।
Bata success story hindi: 1930 के दशक में जे बाटा जब भारत पहुंचे तो उन्होंने देखा कि भारत के ज्यादातर लोग जूते चप्पल नहीं पहनते थे । तब उनके दिमाग में आया कि भारत में बाटा के जूते का विस्तार करना चाहिए । उन्होंने कोलकाता से सटीक कोनार नाम से छोटे से गांव में कंपनी की शुरुआत की ।
2 सालों के अंदर जूते की मांग इतनी बढ़ गई कि कंपनी को अपना प्रोडक्शन बढ़ाना पड़ा। जिससे यह टाउनशिप बन गया जिसे लोग बाटा नगर के नाम से जानने लगे । 1935 तक बाटा दुनिया में रोजाना 1लाख 68000 जोड़ी जूते बनाता था । 1938 तक बाटा के पास 65000 कर्मचारी थे । अकेले भारत में उस समय सिर्फ 4000 कर्मचारी थे। जो रोजाना 3500 जोड़ी जूते बनाते थे।
बाटा पहली ऐसी कंपनी है, जिसने टेनिस बूट को डिजाइन किया था। उस समय सफेद कैनवास पर बने टेनिस के जूते को खिलाड़ियों के साथ लोगों ने काफी पसंद किया । 1980 के दशक में बाटा को पैरागन और खादी जैसी कंपनियां से अच्छी खासी टक्कर मिलने लगी ।
कंपनी ने मार्केट में खुद को आगे रखने के लिए विज्ञापन का सहारा लेना शुरू किया टैगलाइन में लिखा , टेटनस से सावधान रहे ,एक छोटी सी चोट आपकी जिंदगी के लिए खतरनाक साबित हो सकती है। इसलिए जूते जरूर पहनें । कहा जाता है की टैगलाइन के चलते भारत में जूते की मांग बढ़ गई । इसके अलावा फर्स्ट टू बाटा , देन टू बाटा टैगलाइन भी काफी। लोकप्रिय थी।
बाटा ने 2013-14 के बाद खुद को पूरी तरह बदलना शुरू किया । कंपनी ने मॉडल डिजाइन पेश किए । नई जनरेशन के लिए बाटा ने मॉडल डिजाइन लॉन्च की । बाटा ने पिछले कुछ सालों बड़े पैमाने पर बदलाव किये । जिसमें प्रोडक्शन पोर्टफोलियो को बढ़ावा देना ,फैशन फॉरवर्ड और ग्लैमर स्टाइल को शामिल है ।L’Oréal Success Story in Hindi: दो कमरों से शुरू हुई कंपनी कैसे बनी दुनिया की सबसे बड़ी कॉस्मेटिक ब्रांड
जिसे भारत के बाजार और खासकर नई पीढ़ी के लोगों ने काफी पसंद किया। इस समय भारत की जनरेशन मॉडल जूते पहनना चाहती थी और इसी बदलाव ने बाटा को नई पीढ़ी के बीच फिर से लोकप्रिय बना दिया।https://en.wikipedia.org/wiki/Bata_Corporation
हॉल ऑफ फेम बास्केटबॉल प्लेयर इरावान जॉनसन ने बाटा के जूते पहनकर अपने करियर की शुरुआत की ।
1994 बाटा ने अपनी 100 वी वर्षगांठ बनाई।
2001 में कंपनी ने थॉमस बाटा के नाम से यूनिवर्सिटी शुरुआत की।
2004 में बाटा ने सबसे ज्यादा जूते बनाने का गिनीज बुक और वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था ।
2007 में थॉमस बाटा को “लाइफ टाइम अचीवमेंट “अवार्ड मिला।
Bata success story hindi : बाटा की कहानी बताती है कि सफलता केवल बड़े निवेश से नहीं बल्कि सही सोच, लगातार मेहनत और समय के साथ बदलाव अपनाने से मिलती है।
किराए के दो कमरों से शुरू हुआ यह सफर आज दुनिया के सबसे भरोसेमंद फुटवियर ब्रांडों में शामिल है। यही वजह है कि बाटा आज भी करोड़ों लोगों के भरोसे का नाम बना हुआ है।
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