MRF SUCCESS STORY : 42000 हजार करोड का रेवेन्यू

  1. MRF SUSSCESS STORY : 14000 से 42000 हजार करोड का सफर

MRF success story :14000 से 42000 करोड़ का सफर

MRF SUCCESS STORY  ,गुब्बारे बेचने से शुरू हुई MRF की सफलता कहानी। ₹11 से ₹1,00,000 तक शेयर, 9109 गुना रिटर्न और भारत की नंबर-1 टायर कंपनी बनने का सफर।

गुब्बारे बेचने से शुरू हुई थी ” MRF “आज गाड़ियों के साथ विमान के टायर भी बनाती है ।दुनिया की पहली कंपनी जिसने 30 सालों में 9109 % का रिटर्न दिया । जब 1993 में कंपनी पहली बार शेयर बाजार में लिस्ट हुई तो कंपनी के शेयर की कीमत मात्र 11 rs थी । आज इसके शेयर की कीमत 150000 से भी ऊपर है ।

ऐसा करने बाली भारत की एक मात्र कंपनी है । जो 30%  हिस्सेदारी के साथ मार्केट लीडर है। आज कंपनी का रेवेन्यू 42000 करोड़ है।

आज  भारत में कंपनी की 8 मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है जिनमें  से तीन तमिलनाडु में दो  आंध्र प्रदेश में और एक गोवा  पुडुचेरी और केरल में है।

MRF कंपनी की शुरुआत की

MRF success story1946 में मद्रास की सड़कों पर घूम-घूम पर एक लड़का गुब्बारे बेचा करता था नाम था ,एम मेनन पिल्लई, तब देश आजाद नहीं हुआ था। मेनन का जन्म केरल के एक ईसाई परिवार में हुआ था । वे  कुल 9 भाई बहन थे । पिता कारोबारी थे संपन्न परिवार था ।

लेकिन कहा जाता है कि त्रावनकोर  के राजा आजादी की लड़ाई में शामिल हुए तो उन्होंने मेनन  के पिता की संपत्ति ज़ब्त कर ली  । उसके बाद पिता का कारोबार ठप हो  गया।  इस मुश्किल हालात में  मेनन ने ₹14000 लगाकर गुब्बारा बनाने वाली छोटी कंपनी  खरीदी । शुरुआत की मेनन टीन शेड से बनी एक दुकान में   गुब्बारे बनाते थे  और उन्हें बैग  में  भरकर  गली-गली घूम कर बेचा करते थे ।https://en.wikipedia.org/wiki/MRF_(company)

1949 में मैनन की कंपनी गुब्बारे  के अलावा रबर  के खिलौने, ग्लब्स  और कंडोम बनाने लगी । 1952 में उन्हें पता चला कि एक विदेशी कंपनी पुराने टायर को फिर से इस्तेमाल करने वाली कंपनी को ट्रेड रबर दे रही है । ( यहां ट्रेड रबड़ से मतलब है जो टायर सड़क के संपर्क में आता है) । मेनन को लगा कि भारत में ट्रेड रबड़ बनाने की यूनिट क्यों नहीं लगा सकते । मेनन अपनी जमा पूजी इकट्ठा करके” ट्रेड रबर” के  बिजनेस में घुसे ।  यही आगे चलकर एमआरएफ ( MRF) बना।

कंपनी बनने के 5 साल और भीतर मार्केट लीडर बन गई

MRF success story, मेनन  का बिजनेस चल पड़ा उनकी कंपनी फेमस हो गई उसे समय यह भारत की एकमात्र कंपनी थी । जो ट्रेड रबर बना रही थी।  इस क्षेत्र की बाकी कंपनियां विदेशी थी कंपनी  बने हुए  4 साल हुए थे लेकिन उसका विस्तार तेजी से हो रहा था कंपनी के अच्छी क्वालिटी के प्रोडक्ट लोगों को पसंद आ रहे थे । जल्द ही  मैनन की कंपनी का  50% बाजार पर कब्जा हो गया।  इस वजह से विदेशी कंपनी को भारत छोड़कर जाना पड़ा ।

एमआरएफ (MRF ) ट्रेड रबड़ से टायर के सेगमेंट में दाखिल हुई।  1960 में  मेनन ने टायर बनाने की ठानी  लेकिन यह काम इतना  आसान नहीं था । ना ही यह बिना विदेशी कंपनियों की  मदद के बिना  मुमकिन था।  ऐसे में MRF  को अच्छी क्वालिटी के टायर बनाने के लिए विदेशी कंपनियों से मदद की जरूरत थी । ताकि उन्हें टेक्नोलॉजी की मदद ली जा सके , मेनन ऐसा करने में सफल रहे । यूएस  की मेंसफील्ड टायर एंड  रबर कंपनी MRF की मदद के लिए राज हुई।

मेनन  ने एक नई मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाई जिसका उद्घाटन तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री के. कामराज ने किया ।  1961 में टायर का पहला बैच  बनाकर तैयार हुआ । इसी साल MRF (एमआरएफ)  ने मद्रास स्टॉक एक्सचेंज में आईपीओ  भी लॉन्च  किया ।

पहली भारतीय कंपनी जिसने अमेरिका में टायर्स एक्सपोर्ट किए-

MRF success story, 1967 में  भारत की एक ऐसी पहली कंपनी बनी जिसने अमेरिका में टायर्स भेजे थे । अमेरिका में टायर export करना इसलिए खास था  क्योंकि अमेरिका ही वह देश था जहां दुनिया में सबसे पहले टायर बनाने शुरू हुए थे। 1973 में पहली बार नायलॉन टायर्स की मैन्युफैक्चरिंग शुरू की । दरअसल एमआरएफ इससे  पहले जिस तकनीक से टायर बना रही थी वह भारतीय सड़कों के लिए सही नहीं थी । कंपनी ने भारत की  सड़कों के हिसाब से टायर  की तकनीक में बदलाव किया । 70 के दशक में जब भारत मारुति 800 कारों को  रियायती कीमतों पर कर लॉन्च की तो उसके पहियों  की सप्लाई MRF ने की।

1989 में MRF  में दुनिया की सबसे बड़ी खिलौने बनाने बाली  कंपनी” हिस्रबों “के साथ साझेदारी की । और फन स्कूल  ब्रांड लॉन्च  किया। 1889 में ही कन्वेयर बेल्ड  बिजनेस में भी कदम रखा ।

MRF की मार्केट स्ट्रेटजी –

MRF success story, MRF  को हर घर का ब्रांड बनाने के लिए कंपनी ने मार्केटिंग स्ट्रेटजी का काम शुरू किया। कंपनी ने उस वक्त भारत के विज्ञापन जगत का पिता कई जाने वाले एलिक पदमसी से संपर्क किया । पदमसी  इससे पहले बजाज ,फेयर हैंडसम जैसी कंपनियों के लिए काम कर चुके थे। मदमसी  ने एमआरएफ के लिए सीधे ट्रक ड्राइवर से जोड़ने की रणनीति बनाई।  ट्रक ड्राइवर से बात की कि ट्रक का टायर मजबूत और ताकतवर होना चाहिए ।

इसी फीडबैक के अनुसार 1964 में पदमसी ने  कंपनी के लिए  “मसलमैन “का लोगों तैयार किया । यह लोगो आज भी कंपनी की पहचान है ।

MRF का मसालमैन का लोगो जो आज भी कंपनी की पहचान है।

 

 

MRF भारत में बॉक्सिंग चैंपियनशिप भी लाया

MRF भारत में पहली बॉक्सिंग चैंपियनशिप लाया । MRF खेलो के कई खिलाड़ियों को निखारा ।  1980 के दशक में कंपनी ने MRF  पेस फाउंडेशन की स्थापना । की यह फाउंडेशन फास्ट बॉलर्स के लिए कोचिंग क्लीनिक की तरह काम करता था। एक समय था जब सचिन तेंदुलकर से लेकर धोनी तक के बल्ले पर एमआरएफ लिखा होता था।  यह कंपनी की मार्केटिंग के लिए फायदेमंद साबित हुआ । क्रिकेट के अलावा कंपनी भारत में पहली बॉक्सिंग चैंपियनशिप की लाई । इसमें 39 देशों के खिलाड़ियों ने भाग लिया ।अंत तक कंपनी ने f3 रेसिंग कारों का भी निर्माण भी  शुरू किया ।

मद्रास मोटर सपोर्टर क्लब के साथ एमआरएफ ने फार्मूला रेसिंग की सीरीज शुरू की । MRF ने भारत में पहले  फार्मूला  रेसिंग कार ड्राइवर नारायण कार्तिकेयन को  स्पॉन्सर किया ।

4 साल में  कंपनी का टर्नओवर एक अरब डॉलर से दो अरब डालर हो गया ।  2007 में कंपनी ने बड़ा मुकाम हासिल किया । कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक उसका सालाना टर्नओवर  1 अरब डॉलर से ज्यादा हो गया । इस मुकाम तक  पहुंचने में उसे 40 साल लगे । लेकिन आ अरब से 2 अरब होने में सिर्फ 4 साल हो लगे ।   आज MRF के टायर  दुनिया  के 65 देश में एक्सपोर्ट होते हैं ।Indigo success story in hindi : 15 लाख से 73000 करोड़ का बिजनेस ।

टायर के अलावा  कंपनी  ट्यूब, पेंट ,कन्वेयर बेल्ट ,खिलौने के बाजार में भी अपनी धमक के साथ मौजूद है..thanks

NOTE- ये कहानी बुक एवं कंपनी के इंटरव्यू के आधार पर आधारित है । समय के साथ कहानी में बदलाब हो सकता है । NEXT SAFLTA KI KAHANI TO BE CONTINUE ….

MRF success story हमें सिखाती है—“कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन सपने बड़े होने चाहिए।

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