Lenskart : पीयूष बंसल की पूरी कहानी : माइक्रोसॉफ्ट की नौकरी छोड़ बनाई 47000 करोड़ की कंपनी

जानिए कैसे पीयूष बंसल ने Microsoft की नौकरी छोड़कर ₹47,000 करोड़ की कंपनी बनाई। IIT में फेल होने से लेकर lenskart को भारत का सबसे बड़ा eyewear brand बनाने तक की पूरी प्रेरणादायक कहानी।
सफलता की कहानी में आज हम बात कर रहे है lenskart के फाउंडर पीयूष बंसल की ,जिन्होंने न सिर्फ इंडिया की बड़ी परेशानी को समझा बल्कि उसे 47000 करोड़ के मेगा ब्रांड में बदल दिया । IIT में एडमिशन ना मिलने से लेकर ,कैनेडा में रिसेप्शनिस्ट की जॉब करने तक ,पीयूष बंसल का सफर हार न मानने की एक बेहतरीन मिसाल है । इस पोस्ट में पढ़िए कि कैसे “Search My Campus ” से शुरू हुआ सफर आज दुनिया भर में 2000 से ज्यादा स्टोर्स तक पहुंच चुका है
फाउंडर : पीयूष बंसल
को फाउंडर – अमित चौधरी और सुमीत कपाही
स्थापना : 2010
मार्केट कैप : ₹47,000+ Crore
विस्तार : 2000+ स्टोर्स ( इंडिया , सिंगापुर, UAE, etc.)
सक्सेस मंत्र : इंडिया को बिलैंड कैपिटल से बाहर निकालना
पीयूष बंसल ने माइक्रोसॉफ्ट की जॉब छोड़कर शुरुआत की। लेंसकार्ट को मजबूत रेवेन्यू ग्रोथ और कम समय में बड़ा ब्रांड बनने पर स्टार्टअप ऑफ द ईयर का अवार्ड मिला था । इकोनामिक टाइम्स के अनुसार lenskart का मार्केट कैप 47000 करोड़ से अधिक का है
पीयूष ने एक इंटरव्यू में कहा था कि बार उन्हें बिल गेट से मिलने का मौका मिला था । उनसे मुलाकात के बाद ही कुछ अलग करने का सोच लिया ।
लोगो की परेशानी समझी ओर काम शुरू किया
USA माइक्रोसॉफ्ट की नौकरी से रिजाइन करने के बाद पीयूष दिल्ली आ गए । कुछ महीने ऐसे ही गुजर गए । मन में ठान रखा था कि अपना कुछ और बड़ा करना है। वे ये भी जानते थे कि दिल्ली आने वाले यूथ को किराए पर मकान के लिए कितनी परेशानी होती है । काम शुरू करने से पहले उन्हें मार्केट रिसर्च की जरूरत थी । उन्होंने एक क्लासिफाइड वेबसाइट सर्च माय कैंपस शुरू की । यह छात्रों को किताबें, पार्ट टाइम जॉब और कारपुल जैसी चीज ढूंढने के मदद करती थी।
उन्होंने इस प्रोजेक्ट पर काम किया। इसके जरिए इंडियन कस्टमर का बिहेवियर और रिक्वायरमेंट को समझा । 3 साल तक लोगो की जरूर को समझने के बाद पियूष बंसल ने 4 साल अलग-अलग वेबसाइट लांच की । इनमें से एक आईवियर थी । वही बाकी तीन कंपनियां टूथ को टारगेट करके करते हुए ज्वेलरी, घड़ी और बैग्स की थी । रिस्पांस को देखते हुए उन्होंने आईवियर पर फोकस किया ओर यहीं से लेंसकार्ट की शुरुआत हुई ।
पीयूष बंसल ने आईवियर पर अपना पूरा ध्यान लगाते हुए देश के छोटे-बड़े शहरों में आउटलेट्स खोलने शुरू किए। जहां पर हर रेंज के चश्मा के साथ आंखों के चेकअप की सुविधा भी दी जाने लगी थी। साथ ही इन चश्मों को मार्केट में बेचना शुरू किया। इसी यूनिक कॉन्सेप्ट को देखते हुए पीयूष को कई नए इन्वेस्टर मिले ।
पीयूष बंसल: जन्म और स्कूली शिक्षा

पीयूष बंसल का जन्म 26 अप्रैल 1985 को दिल्ली में हुआ था। उनके पिता चार्टर्ड अकाउंटेंट ओर मां हाउस मैनेजर थी। एक बड़ा भाई और एक छोटी बहन भी है । पिता चाहते थे कि बच्चे खूब बड़े अच्छी नौकरी करें । पीयूष की स्कूलिंग दिल्ली से ग्रेटर कैलाश के डॉन बोस्को स्कूल में हुई थी । वे IIT करना चाहते हैं लेकिन कम नंबर की वजह से किसी भी इंस्टिट्यूट में एडमिशन नहीं हुआ । 2002 में पीयूष इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर में BE करने कनाडा चले गए। यहां उन्होंने मैकगिल यूनिवर्सिटी में दाखिला ले लिया ।
रिसेप्शनिस्ट की जॉब के साथ कोडिंग सीखी
कनाडा में भी पीयूष को पार्ट टाइम जॉब की जरूरत थी। उन्होंने रिसेप्शनिष्ट का काम किया । वो जहां जॉब पार्ट टाइम जॉब कर रहे थे वही कंप्यूटर लैब थी । पीयूष के एक सीनियर उस लैब में कोडिंग का काम करते थे। पीयूष कोडिंग में इंटरेस्ट लेने लगे यह बात उन्होंने अपने सीनियर को बताई । सीनियर ने उन्हें कोडिंग से रिलेटेड एक किताब दी। पीयूष दिन में कॉलेज और रिसेप्शन पर काम करते और रात में कोडिंग सीखते। धीरे-धीरे उन्होंने सॉफ्टवेयर डिजाइनिंग भी सीख ली ओर अपने सीनियर को कुछ सॉफ्टवेयर डिजाइन करके दिए। इसके बाद पीयूष को रिसेप्शन से हटा दिया गया और मैं उसी कंपनी में कोडिंग की जॉब मिल गई ।
माइक्रोसॉफ्ट की नौकरी छोड़कर भारत आए
कॉलेज में दूसरे साल के दौरान पीयूष ने माइक्रोसॉफ्ट में इंटर्नशिप के लिए अप्लाई किया । एप्लीकेशन फॉर्म सिलेक्ट भी हो गया। उन्हें इंटरव्यू के लिए बुलाया गया लेकिन वे इंटरव्यू में सेलेक्ट नहीं हुए । पीयूष ने हार नहीं मानी ओर 1 साल तक इंटरव्यू की तैयारी की। दूसरे अटेम्प्ट में उनका सिलेक्शन हो गया । 3 महीने की इंटर्नशिप पीयूष के लिए एक सपने की तरह रही थी ।
उनका मन हुआ की परमानेंट जॉब भी नहीं यही करनी है। इसके लिए उन्होंने बहुत मेहनत की साथ में कॉलेज पूरा होते माइक्रोसॉफ्ट में नौकरी हासिल कर ली। लेकिन एक साल बाद ही उनका मन बदल गया क्योंकि उन्हें लगा कि बस यहां वे प्रोडक्ट में इंप्रूवमेंट कर रहे हैं । उन्होंने भारत वापस आकर अपना कुछ करने के बारे में सोचा। पीयूष के माता-पिता, दोस्त इस फैसले से खुश नहीं थे । पीयूष पर इतनी अच्छी जॉब न छोड़ने का दबाव भी डाला । लेकिन पियूष नहीं माने और 2008 में भारत लौट आए ।
कनाडा में पढ़ाई के दौरान उनके दोस्त इंडिया को ब्लाइंड कैपिटल कह के पुकारते थे। दोस्तो की यह बातें बहुत चुभती , लेकिन कुछ नहीं कर पाते थे। पढ़ाई के बाद पीयूष की USA में माइक्रोसॉफ्ट कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी लग गई । USA से हर दिन फोन करके वे माता-पिता को बताते कि आज क्या-क्या किया। दिल्ली में उनके माता-पिता बहुत खुश थे कि बेटा सेटल हो गया। एक रात अचानक फोन पर पीयूष ने कहा कि मैने नौकरी छोड़ दी है, दिल्ली वापस आ रहा हूं। पिता ने पीयूष को बहुत समझाया ,रिश्तेदारों दोस्तों से फोन करवाया लेकिन वह नहीं माने।
दुनिया को चश्मा पहनने के सपने को लेकर बनाया लेंसकार्ट
पीयूष के दिल्ली लौटने के बाद एक दोस्त अमित चौधरी कोलकाता से आए । अमित को रहने के लिए किराए का मकान नहीं मिल रहा था। उसने यह बात पीयूष से शेयर की । पीयूष ने कहा ज़्ब तक इंतजाम नहीं होतातुम हमारे घर रह सकते हो । तब भी वक्त मिलता तो दोनों नए आइडिया पर बात करते । बातों ही बातों में ब्लाइंड कैपिटल का जिक्र हुआ ।
पीयूष को अपने कनाडा के दोस्त की बात याद आई क्योंकि बे भी इसी बात के बारे में पूछते थे। इस सब्जेक्ट पर पीयूष ने रिसर्च कर जाना कि भारत को दुनिया का ब्लाइंड कैपिटल सिर्फ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां की आधी आबादी को चश्मे की जरूरत है ,लेकिन उसमें से सिर्फ 25% लोग ही चश्मा लगाते हैं ।
2010 में बनी lenskart
पीयूष और अमित ने इसी दिशा में काम करने का फैसला किया। उन्होंने इसी कंपनी बनाने का प्लान बनाया तो भारत के लोगों को चश्मा न पहनने की आदत को बदल सके । उन्होंने लिंकडइन पर एक और को फाउंड सुमित कपाही को ढूंढा । उन्होंने कुछ महीने पहले ही आईवियर कंपनी की नौकरी छोड़ी थी ।

तीनों ने साथ मिलकर 2010 में वैल्यू टेक्नोलॉजी बनाई ,जिसमें अलग-अलग ई-कॉमर्स वेबसाइट थी। इसमें lenskart, ज्यूलकार्ट , बेगकार्ट और वॉचकार्ड वेबसाइट थी। कुछ समय बाद चश्मे के मार्केट में पोटेंशियल देखकर तीनों ने सिर्फ लेंसकार्ट पर फोकस करना शुरू किया ।
चश्मे के लिए बनाया कॉल सेंटर
देश में चश्मा बेचने के लिए पियूष बंसल एक स्कीम लेकर आए, जिसका नाम था “नो क्वेश्चन आस्क रिटर्न पॉलिसी”। यह ऐसी पॉलिसी थी जिसके तहत चश्मा पसंद नहीं आने पर कस्टमर 14 दिन के अंदर वापस कर सकता था। उनसे कोई सवाल नहीं पूछा जाता था। अलग से कॉल सेंटर भी बनाए जहां कस्टमर अपने सवाल पूछ सकते थे । इस पॉलिसी के कारण तेजी से ग्राहक जुड़े और बेहतर नंबर मिलने पर माउथ पब्लिसिटी से ग्राहकों की संख्या बढ़ती गई। आज देश और विदेश में मिलकर कंपनी के पास 70 लाख ग्राहक है।
घर पर ही आंखों की जांच शुरू की ।
2023 में लेंसकार्ट ने घर पर ही हेल्थ सर्विस देना शुरू कर दिया। भारत में 500 से ज्यादा स्टोर खोले गए। 2019 में सिंगापुर में अपना पहला स्टोर शुरू किया । इसी साल 10 लाख लोगों ने कंपनी का ऐप डाउनलोड किया । 2024 तक देश में 2000 से ज्यादा स्टोर हो चुके हैं। इसके अलावा मिडल ईस्ट ,अमेरिका ,ताइवान ,सिंगापुर ,मलेशिया में स्टोर खुल चुके हैं । कंपनी से 10,000 वे ज्यादा कर्मचारी काम करते हैं ।टोयोटा की सफलता की कहानी | दुनिया की सबसे भरोसेमंद कार कंपनी कैसे बनी Toyota
एक इंटरव्यू में पियूष कहते हैं मैने माइक्रोसॉफ्ट में जाकर सीखा कि प्रॉब्लम को प्रॉब्लम की तरह देखना चाहिए ,बिजनेस की तरह नहीं। वहां सारा फोकस कस्टमर पर होता था । हम उनकी दिक्कतें पता करके उन्हें सॉल्व करते थे। हम बिजनेस के लिए नहीं बल्कि अपने कस्टमर को खुश करने के लिए काम करते थे ।
टेक्नोलॉजी पर आधारित lenskart का बिजनेस मॉडल
पीयूष ने lenskart की शुरुआत से ही कई तकनीक पर फोकस किया था। मैन्युफैक्चरिंग प्लांट में रोबोट की मदद से चश्मा बनाना शुरू किया। सप्लाई चैन को मजबूत करने AI का यूज करके रियल टाइम स्टॉक और सप्लाई की जानकारी मिलती रहती है । हर स्टोर में टैंगो वीडियो एनालिसिस सोफ्टवेयर का यूज होता है। यह सॉफ्टवेयर सीसीटीवी की मदद से स्टॉक में ग्राहकों की संख्या, फुटबॉल और दूसरी चीजों के आधार पर जानकारी का विश्लेषण करता है । जिसमें स्टोर में जरूरत के हिसाब से सुधार किए जाते है ।
कंपनी ने राजस्थान के भिवाड़ी में दुनिया की पहली ऑटोमेटिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट शुरू की। वर्तमान में दिल्ली ,गुड़गांव के साथ चीन में भी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट है । कंपनी ने बेगलुरु में भी अपना प्रोडक्शन शुरू किया ।
Lenskart का सक्सेस मंत्र
Lenskart तीन बातों पर फोकस करता है ।
1.चश्मा आम आदमी के लिए अफॉर्डेबल बनाना ।
2.आईवायर को ट्रीटमेंट न बनाकर स्टाइल सिंबल बनाना ।
3. ज्यादा से ज्यादा लोगों तक ऑप्टिशियन पहुंचना।https://en.wikipedia.org/wiki/Lenskart
Lenskart बाकियों से अलग है क्योंकि लोकल दुकान में चश्मा बनने में कई दिन लगते हैं लेकिन lenskart में यह काम एक-दो दिन या घंटों में हो जाता है। एप या वेबसाइट पर वर्चुअल ट्राई ऑन का ऑप्शन है जिससे कस्टमर घर से एक सेल्फी क्लिक कर हजारों चश्मे के डिजाइन ट्राई कर सकता है। साथ ही 14 दिन नो क्वेश्चन आस्क रिटर्न पॉलिसी से लोगो का विश्वास भी बढ़ा।
कंपनी का 5 सालों का रेवेन्यू
2019 – 474 करोड़
2020 – 900 करोड़
2021 – 905 करोड़
2022 – 1502करोड़
2023 – 3788 करोड़
2024 – 5428 करोड़
Sours – बुक्स,न्यूजपेपर ओर उनके दिए हुए इंटरव्यू के आधार पर