Biography

द्रौपदी मुर्मू :  –  15th  president of india

द्रौपदी मुर्मू :  – 15th President of india 

द्रोपदी  मुर्मू ।तीन बच्चों, पति और परिवार को खोने के बाद भी हार नहीं मानी। जानिए कैसे द्रौपदी मुर्मू बनीं भारत की राष्ट्रपति।

कुछ कहानियाँ सिर्फ पढ़ी नहीं जातीं,महसूस की जाती हैं। द्रौपदी मुर्मू की कहानी ऐसी ही है — जहाँ दर्द, नुकसान और अकेलापन है, लेकिन अंत में अदम्य साहस की जीत है।

1983 घने जंगलों के बीच बसे  आदिवासी गांव की एक महिला सिंचाई विभाग  में क्लर्क थी।  उनके पति प्राइवेट बैंक में जॉब करते थे ।दोनों की नौकरी  अलग-अलग राज्यों में थी।  इसलिए नौकरी के साथ-साथ 3 साल की बेटी की देखभाल करना महिला के लिए मुश्किल काम था।

एक रोज निमोनिया से बेटी की जान चली गई।  ससुराल वाले  महिला पर लगातार नौकरी छोड़ने का दवाब  बना रहे थे । आखिरकार महिला ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और पति के साथ रहने लगी ।

27 साल बाद यानी 25 अक्टूबर 2010 की बात है । उस  महिला का बड़ा बेटा रात को पार्टी से लौटा , सुबह उसकी तबीयत बिगड़ गई अस्पताल पहुंचते – पहुंचते उसने दम तोड़ दिया।  करीब ढाई साल बाद 5 जनवरी 2013 में महिला का छोटा बेटा भी सड़क हादसे में गुजर गया।

कुछ महीने बाद उनकी मां और भाई भी चल बसे । 19 महीने बाद यानी अगस्त 2014 में महिला के पति की  भी मौत हो गई । 4 साल के भीतर पांच मौतों से महिला डिप्रेशन में चली गई । लेकिन 8 साल बाद यानी 25 जुलाई 2022 को वह महिला भारत के सबसे ऊंचे पद पर पहुंची।  नाम में “द्रोपति मुर्मू “।

सफलता की कहानी में आज हम बात करेंगे देश की पहली आदिवासी  महिला ओर दूसरी  महिला राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की बायोग्राफी के बारे में ,

द्रौपदी मुर्मू :biography of droupadi murmu

द्रौपदी मुर्मू , उड़ीसा के मयूर मयूरभंज जिले के रायरंगपुर  से करीब 25 किलोमीटर दूर उपरबेड़ा नाम का एक गांव है । घने जंगलों के बीच बसे इस गांव की आबादी करीब 3000 के करीब है ।

1958 की बात है उपरबेड़ा और आसपास के इलाकों में मानसून में दस्तक दस्तक दे दी थी । क्योंकि वहां कई दिनों से बारिश नहीं हो रही थी।

संथाली परंपरा के मुताबिक बारिश  के लिए विरांची नारायण ने घर के पिछवाड़े बरगद के पेड़ के नीचे की मिट्टी का बर्तन रखा।  स्थानीय लोग उसे पुती कहते थे।  पुती  रखने के ठीक-एक हफ्ते बाद 20 जून 1958 को बिरंचि टुडू को एक बेटी हुई।  संयोग से बच्ची के जन्म के बाद इलाके में बारिश भी होने लगी।  एक साथ बिरांचीं को दोहरी खुशी मिली । उन्होंने बेटी का नाम रखा” पुति”

एक इंटरव्यू में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू बताती है कि संथाली परिवार में बेटी का नाम दादी के नाम पर रखा जाता है।  ताकि दादी के मरने पर भी उनका नाम जिंदा रहे । इसलिए मेरा एक  नाम दुर्गी भी था , लेकिन यह नाम मेरे शिक्षक को पसंद नहीं था तो उन्होंने मेरा नाम द्रोपती रख दिया ।

द्रौपदी मुर्मू का संघर्ष ओर  शिक्षा

द्रौपदी मुर्मू की एक किताब “मैडम प्रेसिडेंट ”  जिसमें उड़ीसा के सीनियर जर्नलिस्ट संदीप साहू लिखते है कि 70 के दशक की बात है।  एक रोज जमकर बारिश हो रही थी दूर-दूर तक सिर्फ पानी ही  पानी नजर आ रहा था।  स्कूल की प्रिंसिपल और शिक्षक वासुदेव बहरा स्कूल में छुट्टी घोषित करने के बारे में बात सोच रहे थे । उन्हें लगा था कि इतनी बारिश में कोई स्कूल नहीं आ पाएगा ।

थोड़ी देर बाद उनकी नजर 7- 8 साल की  द्रोपदी पर  पड़ी । वह पूरी तरह भीग गई थी । लेकिन उसने अपना बैग देखना नहीं दिया।  वासुदेव ने पूछा की बारिश में तुम स्कूल कैसे आ गई । द्रौपदी ने जवाब दिया सर में नदी तैर कर आई हूं । उसकी जज्बा  देखकर वासुदेव और प्रिंसिपल दंग रह गए।

संदीप साहू  आगे लिखते हैं द्रौपदी का बचपन बहुत  तंगहारी में गुजरा।  उनके पास जूते खरीदने तक के पैसे नहीं थे।  इसलिए वह नंगे पांव स्कूल जाती थीं  पूरे साल उन्हें दो जोड़ी कपड़े में गुजारा करना पड़ता था ।वो कपड़ों को बारी बारी से धोकर अपना काम चलाती थी । रोजाना सुबह  उठकर बरतन धोना ,फॉर्स की सफाई करना , कुएं से  पानी निकालना, गोशाला की सफाई ,जैसे काम निपटाने के बाद ही वो  स्कूल जाती थी ।

उस दौरान गांवों में चावल से भूसी निकलने के लिए लकड़ी के लीवर का इस्तेमाल किया जाता था । द्रौपदी की दादी उन्हें सुबह चार बजे ही जगा देती थी । द्रौपदी ,दादी के साथ मिलकर चावल की भूसी  निकालती थी ।उनकी दादी हमेशा कहती थी कि द्रौपदी  तुम्हे क्या लगता है कि तुम पढ़ लिखकर स्वर्ग पहुंच जाओगी ।

वह द्रौपदी  को ढिबरी जलाने पर भी डांटती थी। तुम स्कूल क्या करने जाते हो बही क्यों नहीं पढ़ लेते हो पता है यह केरोसिन कितना महंगा है । द्रोपदी के पिता के पास उनके लिए नई किताबे खरीदने के पैसे भी होते है । वे कक्षा कर चुके बच्चों के पिता से द्रोपदी वीके लिए किताबे मांगते थे । द्रोपदी उन किताबों को गोद से  चिपकाकर  पढ़ती थी । गोद नहीं मिलता तो वो चावल उबालकर उससे किताबें चिपकाती थी।

द्रौपदी को बचपन  से झुकना पसंद नहीं

द्रौपदी मुर्मू बचपन से  ही सच के साथ मजबूती से खड़ी रही है । एक किस्सा  याद करते हुए द्रोपदी  को  पढ़ाने वाले वासुदेव बेहरा कहते हैं,  वह क्लास टॉपर थी । हमेशा सबसे ज्यादा नंबर उन्हीं के आते थे।  नियम के मुताबिक मॉनिटर उन्हें ही बनना चाहिए था लेकिन क्लास में लड़कियों की संख्या काफी कम थी । 40 छात्रों में सिर्फ 8 लड़कियां थी।

लड़के नहीं चाहते की द्रौपदी मॉनिटर बने।  हमारे मन में शंका थी की लड़की होकर वह पूरी क्लास को कैसे संभालेगी । लेकिन द्रौपदी अड़ जाती थी । उन्होंने मुझसे पूछा क्या मैं मॉनिटर नहीं बन सकती।  इस पर मैंने कहा कि तुम मॉनिटर बन सकती हो तुम जरूर बनोगी और द्रौपदी मॉनिटर  बन गई।

राजनीति में आने के बाद भी इसकी बानगी  देखने को मिली । 2017 की बात है ,जब द्रोपदी  झारखंड की  राज्यपाल थी । भाजपा सरकार CNT – SPT संशोधन विधेयक लेकर आई थी।  आदिवासी इसका विरोध कर रहे थे।  इस कानून के लागू होने के बाद आदिवासियों की जमीनों की व्यावसायिक कामों के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।  मुर्मू ने उस  विधेयक   को वापस कर दिया ।

मंच पर चढ़कर मंत्री से कहा मेरा दाखिला भुवनेश्वर में कराइए।

संदीप साहू अपनी किताब मैडम प्रेसिडेंट में लिखते हैं , कि हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए उपरबेड़ा के लड़के लड़कियों को 10 किलोमीटर दूर बादामपहाड़ गांव  जाना पड़ता था । एक दिन द्रोपदी को पता चला कि उड़ीसा सरकार के मंत्री कार्तिक मांझी रायरंगपुर में एक बैठक को संबोधित करने आ रहे हैं।

द्रोपदी ने पिता से कहा कि वो भी इस सभा में जाएगी।  पहले उनके पिता तैयार नहीं हुई लेकिन फिर उनकी जिद के बाद मान गए।  बैठक में मंत्री मांझी अपना भाषण खत्म करने वाले थे की द्रोपदी तेज कदमों से मंच पर पहुंच गई । उनके पिता हैरान हो गए कि यह कहां जा रही है।  द्रोपदी ने सभी के सामने अपनी सातवीं कक्षा साथ  मार्कशीट लहराते हुए मंत्री की तरफ मुड़कर कहा कि मैं आगे की पढ़ाई भुवनेश्वर में करना चाहती हूं।  वहां  दाखिल करने में मेरी मदद करे ।

उस दौर में लड़कियों का घर से बाहर निकलना ही बड़ी बात होती थी।  तब 11-12 साल की द्रोपदी का मंच पर चढ़ना अपने अधिकारों की मांग करना बड़ी बात थी ।

द्रौपदी की बात सुनकर मंत्री की खुश हुए और हैरान भी।  फिर उन्होंने अपने कर्मचारियों से कहा कि इसके दाखिले की व्यवस्था की जाए।  थोड़े दिनों बाद भुवनेश्वर में यूनिट 2 गर्ल्स हाई स्कूल में द्रोपदी का दाखिला करा दिया ।

द्रोपदी मुर्मू – कभी केंटीन नहीं गई

संदीप साहू लिखते हैं द्रौपदी मुर्मू का दाखिला भुवनेश्वर में तो हो गया लेकिन उनकी आर्थिक मुश्किलें उनका पीछा नहीं छोड़ रही थी । उनके पिता महीने के खर्च के लिए मैं ₹10 भेजते थे । पैसे बचाने के लिए द्रोपदी स्कूल के 4 सालों में एक बार भी कैंटीन नहीं गई ।

द्रौपदी पढ़ाई के साथ-साथ दूसरी गतिविधियो में भाग़ लेती थी ।एक बार उनका सिलेक्शन दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड के हुआ था । तब दिल्ली आने जाने में 60 रुपए खर्च था। द्रोपदी ये रकम भी नहीं जुटा पाई । वो गणतंत्र दिवस की परेड में भी शामिल नहीं हो पाई।

द्रौपदी मुर्मू , ग्रेजुएशन करने के साथ साथ सरकारी नौकरी की तैयारी कर रही थी। । उन दिनों राज्य सरकार ने आदिवासी छात्रों के लिए विशेष भर्ती अभियान शुरू किया था । द्रोपदी ने भी इसके लिए अपलाई कर दिया।

फाइनल ईयर का रिजल्ट आने से पहले 1979 में उनका सिलेक्शन भी हो गया । सिंचाई विभाग में वो क्लर्क बन गई ।

द्रोपदी मुर्मू की शादी ओर राजनीति में एंट्री 

द्रौपदी मुर्मू की एक क्लासमेट थी । जिसका नाम डेल्हा था। वो द्रोपदी की शादी का किस्सा याद करते हुए बताती है । मयूरभंज जिले में ही पहाड़पुर गांव है । उसी गांव के रहने वाले श्याम चरण मुर्मू पुरी में एक दफ्तर में अकाउंटेंट थे । अक्सर काम के सिलसिले में बे भुवनेश्वर आते जाते थे।  इस दौरान उनकी मुलाकात द्रोपदी से हुई ।

श्याम द्रौपदी को पसंद करते थे । एक रोज उन्होंने मुझसे कहा कि वो द्रोपदी के सामने शादी का प्रस्ताव रखना चाहते हैं । मैने उनकी बात द्रोपदी तक पहुंचाई । थोड़ा बहुत विरोध होने के बाद दोनों के परिवार शादी के लिए मान गए । अब शादी तो पक्की हो गई लेकिन दहेज तय होना बाकी था । आदिवासियों में लड़के के घर वाले ही रिश्ता लेकर जाते थे । दहेज में तय  हुआ एक गाय ,बैल और 16 जोड़ी कपड़े । श्याम ने  बिना समय गवाए  हां कर दी । और फिर रिश्तेदारों के साथ अपने गांव लौट गए ।कुछ दिन बाद श्याम ओर द्रोपदी  का विवाह हो गया ।

3 साल की बेटी की मौत ओर सरकारी नौकरी को छोड़ना 

शादी के बाद द्रौपदी पति के साथ भुवनेश्वर में शास्त्री नगर इलाके में किराए पर रहने लगी । एक साल बाद दोनों को बेटी हुई उन्होंने उसका नाम “बड़ा मामा” रखा । इसी दौरान उनके पति ने पुरानी नौकरी छोड़कर प्राइवेट बैंक ज्वाइन कर लिया । पति को नई नौकरी के लिए झारखंड जाना पड़ता था ।

नौकरी के साथ-साथ द्रोपदी के लिए बेटी की देखभाल करना मुश्किल काम था । ससुराल वाले उन पर पति के साथ रहने के लिए दवाब  बनाते थे । 1983 में निमोनिया से  द्रोपदी की बेटी की मौत हो गई।  मजबूरन उन्हें सरकारी नौकरी छोड़नी पड़ी। ओर वो अपने पति के साथ झारखंड रहने लगी।

इसी  बीच द्रोपदी मुर्मू को तीन बच्चे हुए, दो बेटा और एक बेटी । कुछ साल बाद वह रायरंगपुर लौट आई । धीरे-धीरे उनके बच्चे बड़े होते गए और स्कूल जाने लगे । अब द्रोपदी  के पास खाली वक्त रहने लगा । राय रंगपुर में रहते हुए  उन्हें 10 साल हो गए थे ।

1994 की बात है द्रोपदी को श्री अरविंदो इंटीग्रल एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर में पढ़ने का ऑफर मिला।  स्कूल में पढ़ाने के लिए वो  तैयार तो  हो गई । लेकिन स्कूल मैनेजमेंट के सामने एक शर्त भी  रखी की वह स्कूल से कोई वेतन  नहीं लेगी।

द्रौपदी मुर्मू की राजनीति में एंट्री

1997 की बात है रायरंगपुर में पार्षद के चुनाव होने  थे ।(  BJP)बीजेपी अब तक उड़ीसा में अपनी पहचान नहीं बन पाई थी।  वह बाढ़ संख्या 2 के लिए उम्मीद उम्मीदवार तलाश रही थी । यह सीट महिलाओं के लिए आरक्षित थी। द्रोपदी जिस संथाल समाज से  आती थी । उस  सीट पर उस समाज का काफी प्रभाव था।  लिहाजा द्रोपदी बीजेपी के लिए सबसे मुफीद उम्मीदवार  थी  क्योंकि उन्हें सरकारी काम करने का अनुभव भी था ।

रविंद्र महंत तब बीजेपी के जिला अध्यक्ष थे । उनका घर द्रोपदी के स्कूल के ठीक बगल में था।  ऐसे में यह स्वाभाविक था कि महंत के घर आने जाने वाले लगभग सभी स्थानीय नेता द्रोपदी को पहचानते थे।  राजकिशोर दास  जो नगर पंचायत अध्यक्ष थे । उन्होंने सबसे पहले द्रोपदी को शिक्षक के जरिए पार्टी में शामिल होने और चुनाव लड़ने का प्रस्ताव भेजा था । लेकिन उन्होंने चुनाव लड़ने से मना कर दिया।

भाजपा नेताओं ने उनके पति श्याम चरण मुर्मू से संपर्क किया । श्याम बैंक में मैनेजर थे । श्याम ने कहां की यह राजनीति हमारे लिए नही है  हम छोटे लोग हैं । औरतों के लिए तो बिल्कुल भी ठीक  नहीं ।

पर BJP नेता उन्हें  मनाने के लिए अड़े रहे।  आखिरकार वे तैयार हो गए द्रोपदी  चुनाव लड़ी और जीत गई । यहां से उनके राजनीतिक सफर की शुरुआत हुई । बाद में द्रौपदी विधायक बनी और उड़ीसा सरकार में मंत्री भी बनी ।

द्रोपदी मुर्मू का महीनों डिप्रेशन में रहना

25 अक्टूबर 2010 की बात है द्रौपदी के बड़े बेटे लक्ष्मण एक पार्टी से लौटे । वे भुवनेश्वर में अपने चाचा के साथ रहते थे । अगली सुबह बीमार हालत में लक्ष्मण को अस्पताल ले जाया गया,   जहां उनकी मौत हो गई।  तब लक्ष्मण की उम्र में 25 साल की थी।

संदीप साहू लिखते हैं जवान बेटे की मौत से द्रौपदी टूट गई और जीने की लालसा खत्म हो गई थी  उन्होंने खुद को अधेरे कमरे में बंद कर लिया  कहीं आती जाती नहीं थी । उन्हें लगता था कि सब कुछ खत्म हो गया।  बाद में  प्रजापति ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय से जुड़ी।  यहां पर नियमित रूप से ध्यान लगाने  आने लगी धीरे-धीरे वह अपने दुखों से ऊपर रही थी । तभी जनवरी 2013 में उनके छोटे  बेटे सिपुन की  सड़क हादसे में जान चली गई । तब उनके बेटे की पत्नी प्रेग्नेंट थी । तब उनका गर्भपात हो गया द्रोपदी के न चाहते हुए भी सीपून की  पत्नी को उनके परिवार वाले अपने साथ ले गए थे ।

द्रौपदी मुर्मू की कॉलेज दिनों की साथी सुरमा पाढ़ी  मैडम प्रेसिडेंट किताब में बताती है कि सीपून की  की मौत के बाद परिवार के सभी लोग रो रहे थे लेकिन द्रौपदी शांत बैठी थी ।  उनके पति खुद पर काबू नहीं कर पा रहे थे । वह डिप्रेशन में चले गए।  बीमार पड़ गए उन्हें पीलिया हो गया । दिन-ब-दिन उनकी तबीयत बिगड़ गई।  अगस्त  2014 में वो भी  गुजर गए। पति का भी साथ छुटने के बाद द्रौपदी मुर्मू डिप्रेशन में चली गई ।

द्रौपदी मुर्मू का झारखंड की  राज्यपाल बनना 

संदीप साहू लिखते  हैं कि पति की मौत से कुछ  पहले द्रौपदी ने राय रंगपुर से बीजेपी की सीट पर विधानसभा चुनाव लड़ा । हालांकि को हार गई ,हार के बाद उन्हें जिला अध्यक्ष बना दिया गया । लगातार एक के बाद एक हादसे से गुजर रही द्रोपदी के पास एक दिन गृह मंत्रालय से फोन आया और उन्हें बायोडाटा भेजने के लिए कहा गया । उस अधिकारी ने बजह तो नहीं बताई  लेकिन द्रोपदी ने अनुमान लगा लिया कि उन्हें निगम अध्यक्ष बनाया जा सकता है ।

आम लोग भी ऐसा ही सोच रहे थे कुछ लोग यह भी कह रहे थे की द्रोपदी को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का सदस्य बन जा रहा है।  इसी बीच IB यानी इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों ने उनसे कांटेक्ट किया।  उन लोगों ने यह जांचा  कि  किसी थाने में द्रोपदी के खिलाफ कोई केस तो नहीं हुआ है ।

IB के अवसरों ने द्रौपदी से कहा था कि जल्द  ही बड़ी खुशखबरी मिलने वाली  हैं । इसके बाद द्रोपदी को खबर मिली कि उन्हें झारखंड का राज्यपाल बनाया जा रहा है। वे झारखंड की पहली महिला राज्यपाल थी।ओर पहली राज्यपाल जिसने 5 साल तक कार्यकाल पूरा किया।

राज्यपाल रहते हुए 2016 में उन्होंने अपने ससुराल के गांव पहाड़पुर में छठवीं से दसवीं तक के छात्रों के लिए स्कूल खोला।  स्कूल का नाम पति और दोनों बेटों की याद में रखा । “श्याम लक्ष्मण सिपुन मेमोरियल स्कूल”।  स्कूल के लिए उन्होंने 3.2 एकड़ जमीन दान कर दी।  झारखंड के राज्यपाल का कार्यकाल पूरा करने के बाद जुलाई 2021 में द्रोपदी अपने शहर रायरंगपुर  वापस लौट आई ।वह अपने छोटे भाई  तारा निशेन ओर भाभी सुकरी के साथ  रहने लगी थी ।

द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति बनना

द्रौपदी मुर्मू : राष्ट्रपति पद की शपथ लेती हुई

 

द्रौपदी मुर्मू, 21 जून 2022 की बात है द्रौपदी  मुर्मू के निजी सहायक रहे विकाश  महांत बताते हैं  कि रात करीब 8:30 बज रहे थे मैं अपने मेडिकल दुकान पर था।  तभी  एक  फोन आया द्रौपदी जी से बात कराइए प्रधानमंत्री जो उनसे बात करना चाहते हैं ।

मुझे बस 5 मिनट दीजिए  मैं फटाफट उनके घर पहुंचता हूं । एक हाथ से फोन कान पर फोन लगाए मैंने उसे व्यक्ति को जवाब दिया और बाइक स्टार्ट करके द्रोपदी के घर के लिए निकल पड़ा । जो वहां से करीब 1 किलोमीटर की दूरी पर पड़ता था ।

मैं द्रौपदी जी के घर के बरामदे तक पहुंचा कि फोन की घंटी दोबारा बजी  जल्दी बात करवाइए प्रधानमंत्री  लाइन पर है ।  मैंने कहा सर में पहुंच गया  हूँ  दो मिनिट  दीजिए ।  हमेशा की तरह द्रौपदी  रात का खाना खाकर सोने की तैयारी कर रही थी ।  मैंने उन्हें फोन देते हुए कहा प्रधानमंत्री जी आपसे बात करना चाहते हैं।  फोन रखने के बाद  द्रोपदी जी ने  जो कहा वह इतिहास बन गया । उन्होंने कहा” मुझे NDA की तरफ से राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया जा रहा है।https://en.wikipedia.org/wiki/Droupadi_Murmu

दरअसल उस रोज द्रोपदी मुर्मू के घर की बिजली चली गई थी । PMO का फोन उन्हें नहीं लगा।  इसके बाद उनके नीचे सहायक रहे विकाश  को फोन किया ।  राष्ट्रपति बनने के बाद एक इंटरव्यू द्रोपदी मुर्मू ने इस किस्से का  जिक्र करते हुए  बताया कि प्रधानमंत्री की बात सुनकर मेरे हाथ पैर सुन रहे थे समझ में नहीं आ रहा था कि क्या जवाब दूं।

  द्रौपदी मुर्मू ने 22 जुलाई 2022 को भारत के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति पद की शपथ ली । 

द्रौपदी मुर्मू की कहानी हमे सिखाती है कि हालत आपको तोड़ सकते है लेकिन आपकी सोच तय करती है कि आप भी इतिहास बना सकते है । 

अगर यह कहानी पसंद आई हो तो ये भी जरूर पढ़ें Coca cola success story in hindi : 27 लाख करोड़ का रेवेन्यू

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